हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हिजरत की रात; अल्लाह और रसूल की राह में अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम की जानिसारी की रौशन निशानी
وَمِنَ النَّاسِ مَن يَشْرِي نَفْسَهُ ابْتِغَاءَ مَرْضَاتِ اللَّهِ ۗ وَاللَّهُ رَءُوفٌ بِالْعِبَادِ
(सूरह बक़रह, आयत 207)
और लोगों में कुछ ऐसे भी हैं जो अपने नफ़्स (आत्मा) को अल्लाह की रज़ा के लिए बेच डालते हैं और अल्लाह अपने बंदों पर बहुत दयालु है।
मोहसिन-ए-इस्लाम हज़रत अबू तालिब अलैहिस्सलाम और मोहसिना-ए-इस्लाम उम्मुल-मोमिनीन हज़रत खदीजा सलामुल्लाह अलैहा की वफ़ात के बाद मक्का का माहौल और भी ज़ुल्म और अदावत से बोझल हो गया था।
क़ुरैश ने यह तय कर लिया था कि विभिन्न क़बीलों के नौजवान एक साथ हमला करके रसूल-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलीहि वसल्लम को शहीद कर दें ताकि बनी हाशिम किसी एक क़बीले से बदला न ले सकें। ऐसे नाज़ुक वक़्त में रसूल-ए-ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि को मदीना की तरफ हिजरत का हुक्म हुआ।
इस योजना की कामयाबी के लिए ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो पूर्ण ईमान, अडिग यक़ीन और बेमिसाल शुजाअत का पैकर हो। साथ ही वह केवल जागते समय ही नहीं बल्कि सोते में भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि की पैरवी और इताअत की ऐसी मिसाल पेश करता हो कि अगर वह उनके बिस्तर पर लेटे तो उन्ही की तरह लगे और सिर्फ अंदाज़ ही ऐसा न हो बल्कि उस से भी मोहम्मदी नूर और खुशबू फैलती हो। और ये सारी विशेषताएँ मौलाया-ए-क़ाइनात अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम में पूरी तरह मौजूद थीं।
जब इमाम अली अलैहिस्सलाम ने सुना कि इस बिस्तर पर लेटना निश्चित खतरे को आमंत्रण देने जैसा है, तो उन्होंने किसी हिचकिचाहट के बिना पूछा: “या रसूलुल्लाह! क्या आप सलामत रहेंगे?” जवाब में हाँ मिला तो मुश्किल कुशा ने मुस्कुरा कर रसूल के बिस्तर को अपना ठिकाना बना लिया। यह मुस्कान दरअसल पूर्ण यक़ीन की निशानी थी। इसी यक़ीन के साथ कि जान अल्लाह की अमानत है और उसकी रज़ा में खर्च हो जाए तो यही असली कामयाबी है।
यह वही लम्हा था जब आसमान ने ज़मीन पर ईसार व क़ुर्बानी की नई तफ़सीर देखी। तलवारों की छाँव में सोना, मौत की आंखों में आंखें डालकर देखना और फिर भी सुकून और इत्मिनान के साथ रज़ा-ए-ख़ुदा पर राज़ी रहना—यही वह रूह है जिसे कुरआन ने “यशरी नफसहु” के शब्दों में बयान किया है।
इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने फरमाया: यह आयत इमाम अली बिन अबी तालिब अलैहिस्सलाम के बारे में नाज़िल हुई, जब उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि के लिए अपनी जान की कुर्बानी का इरादा किया, और उस रात रसूल-ए-ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि के बिस्तर पर सोए जब कुफ्फारे क़ुरैश उनकी तलाश में थे। (तफ़सीर अयाशी, जुल्द 1, पृष्ठ 101)
यह वाक़िया इमामत और विलायत के मफ़हूम को भी रोशन करता है। जो हस्ती हिजरत की रात अपनी जान को ख़तरे में डाल सकती है, वही बाद में दीन (धर्म) की अमानत और उम्मत की रहनुमाई की काबिल ठहरती है। अमीर अल-मोमिनीन अलैहिस्सलाम की शख़्सियत में शुजाअत, इताअत, इख़्लास और कुर्बानी का ऐसा मिश्रण नज़र आता है जो इस्लामी क़ियादत के लिए मापदंड तय करता है।
हिजरत की रात का सबक सिर्फ़ इतिहास का अध्याय नहीं बल्कि हर दौर के अहले ईमान के लिए राह का चिराग़ है। यह हमें सिखाती है कि हक़ की बक़ा के लिए व्यक्तिगत फ़ायदे को कुर्बान करना ही ईमान की मेराज है, रहबर-ए-हक़ की मदद में ख़तरे से डरना कमजोरी है और रिज़ा-ए-इलाही के मुक़ाबले दुनिया की हर आरामदायक चीज़ हीन है।
हिजरत की रात दरअसल ईसार की वह चमकती सुबह है जिसकी किरणें क़यामत तक अहल-ए-ईमान के दिलों को रोशन करती रहेंगी। अमीर अल-मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम का यह क़दम दुनिया तक इस हक़ीक़त की गवाही देता रहेगा कि जब ईमान पूरा हो जाए तो जान भी हल्की लगने लगे और रज़ा-ए-ख़ुदा सबसे कीमती पूंजी बन जाए। यही वह स्थान है जहाँ इंसानियत सरबंद होती है और इतिहास, वफ़ा और फ़िदाकारि के सुनहरी हर्फ़ों से लिखा जाता है।
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